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मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

चंपा का पेड़

सावन  के दिन थे.आये दिन आंधी बारिश आ रही थी आज फिर आंधी आई और चंपा का पेड़ गिर पडा .ये चोथी  बार था जब ऐसा हुआ। मैं परेशान हो गयी थी.गमला छोटा पड़ने लगा था और पेड़ बड़ा हो रहा था। माली
से पुछा तो बोला " बीबीजी इसे जमीन में गडवा दो। वही पनपेगा .मैंने सोचा ठीक है सोसाइटी दफ्तर में पूछ लू.वहां गयी तो एक बुडे से आदमी रजिस्टर से नज़र उठा कर देखते हैं। मैं सर   हिला कर नमस्ते करी हु। वोह बी सर  हिला कर जवाब देते हैं।
"कैसे आना हुआ?"

"जी,मैं अपना पेड़ बगीचे में लगवाना चाहती हु"

"कोन सा पेड़ है?"

"चंपा का है ,इक ही है.आपको कोई आपति तो नहीं?"

"नहीं लगवा सकते!"

में आश्चर्य से "पर क्यों?"

"ऐसे पेड़ नहीं लगवा सकते .सोसाइटी के नियम हैं कुछ!"

"पर वजह क्या है मैं तो लगवा रही हु ,मांग नहीं रही!"

दुसरे व्यक्ति "लगवाने दो न!"

पहले व्यक्ति "ठीक है माली से कह दो"धन्यवाद कह   कर  मैं  ऑफिस से बाहर निकल आई .जैसे अपने बच्चे का दाखिला करवाया हो ऐसा लग रहा था मानो।
माली को बोल कर पिछले बगीचे में जगह बनवाई। और इक कोने में लग गया। मैंने राहत कि सांस ली। अब नहीं गिरेगा बार बार आंधी में।
महनत के १० रूपये दिए माली को और घर चली ।
उसी रात फिर आंधी बारिश आई और में फिर पेड़ के लिए फिकर मंद हुई ।
अगली सुबह जा कर देखती हु तो वो ठीक ठाक  अपनी जगह पर खडा हिलोरे मार रहा था।
जैसे कह रहा हो "देखो माँ, मैं इस बार नहीं गिरा "
में मुस्कुरा कर वापिस घर लौट आई.

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