meri dant yatra
शनिवार, 10 सितंबर 2011
मंगलवार, 22 दिसंबर 2009
चंपा का पेड़
सावन के दिन थे.आये दिन आंधी बारिश आ रही थी आज फिर आंधी आई और चंपा का पेड़ गिर पडा .ये चोथी बार था जब ऐसा हुआ। मैं परेशान हो गयी थी.गमला छोटा पड़ने लगा था और पेड़ बड़ा हो रहा था। माली
से पुछा तो बोला " बीबीजी इसे जमीन में गडवा दो। वही पनपेगा .मैंने सोचा ठीक है सोसाइटी दफ्तर में पूछ लू.वहां गयी तो एक बुडे से आदमी रजिस्टर से नज़र उठा कर देखते हैं। मैं सर हिला कर नमस्ते करी हु। वोह बी सर हिला कर जवाब देते हैं।
"कैसे आना हुआ?"
"जी,मैं अपना पेड़ बगीचे में लगवाना चाहती हु"
"कोन सा पेड़ है?"
"चंपा का है ,इक ही है.आपको कोई आपति तो नहीं?"
"नहीं लगवा सकते!"
में आश्चर्य से "पर क्यों?"
"ऐसे पेड़ नहीं लगवा सकते .सोसाइटी के नियम हैं कुछ!"
"पर वजह क्या है मैं तो लगवा रही हु ,मांग नहीं रही!"
दुसरे व्यक्ति "लगवाने दो न!"
पहले व्यक्ति "ठीक है माली से कह दो"धन्यवाद कह कर मैं ऑफिस से बाहर निकल आई .जैसे अपने बच्चे का दाखिला करवाया हो ऐसा लग रहा था मानो।
से पुछा तो बोला " बीबीजी इसे जमीन में गडवा दो। वही पनपेगा .मैंने सोचा ठीक है सोसाइटी दफ्तर में पूछ लू.वहां गयी तो एक बुडे से आदमी रजिस्टर से नज़र उठा कर देखते हैं। मैं सर हिला कर नमस्ते करी हु। वोह बी सर हिला कर जवाब देते हैं।
"कैसे आना हुआ?"
"जी,मैं अपना पेड़ बगीचे में लगवाना चाहती हु"
"कोन सा पेड़ है?"
"चंपा का है ,इक ही है.आपको कोई आपति तो नहीं?"
"नहीं लगवा सकते!"
में आश्चर्य से "पर क्यों?"
"ऐसे पेड़ नहीं लगवा सकते .सोसाइटी के नियम हैं कुछ!"
"पर वजह क्या है मैं तो लगवा रही हु ,मांग नहीं रही!"
दुसरे व्यक्ति "लगवाने दो न!"
पहले व्यक्ति "ठीक है माली से कह दो"धन्यवाद कह कर मैं ऑफिस से बाहर निकल आई .जैसे अपने बच्चे का दाखिला करवाया हो ऐसा लग रहा था मानो।
माली को बोल कर पिछले बगीचे में जगह बनवाई। और इक कोने में लग गया। मैंने राहत कि सांस ली। अब नहीं गिरेगा बार बार आंधी में।
महनत के १० रूपये दिए माली को और घर चली ।
उसी रात फिर आंधी बारिश आई और में फिर पेड़ के लिए फिकर मंद हुई ।
अगली सुबह जा कर देखती हु तो वो ठीक ठाक अपनी जगह पर खडा हिलोरे मार रहा था।
जैसे कह रहा हो "देखो माँ, मैं इस बार नहीं गिरा "
में मुस्कुरा कर वापिस घर लौट आई.
महनत के १० रूपये दिए माली को और घर चली ।
उसी रात फिर आंधी बारिश आई और में फिर पेड़ के लिए फिकर मंद हुई ।
अगली सुबह जा कर देखती हु तो वो ठीक ठाक अपनी जगह पर खडा हिलोरे मार रहा था।
जैसे कह रहा हो "देखो माँ, मैं इस बार नहीं गिरा "
में मुस्कुरा कर वापिस घर लौट आई.
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009
मेरी दंत यात्रा
दांत का दर्द क्या होता है कोई मुझ से पूछे......!
इस तकलीफ से जो में गुजारी हु कोई दुश्मन भी न गुजरे..हुआ यूँ
की प्यारी सी सन्डे की सुबह थी..और मैंने बिस्तर से उठ कर अंगडाई लेते हुए जैसे ही मुह खोला की.....आआआआअ जम्हाई की जगह ऊई मा ये कैसा दर्द मेरे जबडे में हुआ!!
"क्या हुआ मम्मी क्या बेड से गिर गई!!" रिंकू ने पुछा...
नहीई..... आअह्ह्ह मेरा दांत दर्द कर रहा है...
"ओह फ़िर ठीक है..."रिंकू ने तसल्ली से बोला
मैंने उसकी तरफ़ गुस्से से देखा...
हे भगवान्..डेंटिस्ट की भयंकर तस्वीर मेरे जेहें में तैर गयी...
"अब क्या होगा!"
"अरे कुछ नही होगा में नम्बर ले लेता हु डेंटिस्ट का तुम तैयार हो जाओ!!"हमारे इकलोते पति ने तसल्ली दी।
कैसे तैयार हो जाऊं..डेंटिस्ट के तो पिछले १५ साल से नही गयी...इक बार जो बचपन में इक डॉक्टर ने खीच क दांत उखाडा था उसका दर्द याद आ गया॥
दुखी मन से इक हाथेली बाएं गाल पे रख तयार होने लगी..
सन्डे का सत्यानाश हो गया क्या क्या रात को सपने सजाये थे..दिएर से जागेंगे आलू कचोडी लालाजी की खाना जायेंगे..दिन में कड़ी पकोडा.....उफ्फ्फ
"अरे मम्मी कुछ नही होगा ..डॉक्टर अंकल सुई चुबयेंगे बस और दांत दर्द गाएब..."
"तू तसल्ली दे रहा है या डरा रहा है!! "मै गुस्से मै बोली..हाय बोला बी नही जा रहा...
अपने पत्देव के साथ स्कूटर पे बैठ कर जैसे ही क्लीनिक पहुची तो पहले से ही दात दर्द के मारो की भीड़ जमा थी
"जी क्या नम्बर है"पतिदेव ने रिसेप्शन पर बैठी लड़की से पुछा
"५ वा "
ओह्ह....तब तक तो मै बेहोश हो जाउंगी दर्द क मारे...
गाल पर हाथ रख मैंने भरी पग भरे सीट को ओर।
तभी अंदर से आवाज आई ....आआआह्ह्ह्ह्ह
मेरे होश उड़ गए...भगवान् आज बचाले कभी कुछ नही मांगूगी जिंदगी भर ..मैं मन मन मै बोली
"बाहर चलते है न अभी दिएर है नम्बर आने मे"
मैंने पतिदेव को सुझाव दिया तबी रिसेप्शनिस्ट चिल्लाई
"नम्बर 5"
"चलो अंदर नम्बर आ गया "
घबराते हुए मैं अंदर के कमरे मे दाखिल हुई
इक भयंकर पुरूष मुह पर नकाब लगाये अपने औजारों को हाथ मे लिए जैसे मेरा ही इंतज़ार कर रहा हो
मुझे पसीने आने लगे..."चलो"पतिदेव ज़ोर देने लगे॥
"ठीक है वापिस चलो"मे पलटी
"वहां नही यहाँ"
(नही.....मे मन मे जय माता की जय माता की बोलने लगी)
आईये आईये ..क्या तकलीफ है आपको बैठिये .उसने लम्बी से सीट की तरफ़ इशारा किया
मे सकुचाते हुए बैठी ओर बोली "दत मे दर्द है इस तरफ़.."
"मुह खोलिए आआ "
आआ ओह बाएं गाल मे दाड़ की तरफ़ चिला हुआ है अकाल दाड़ घिसनी पड़ेगी या निकाल ही दूँ!!
"नाह्ह नही डॉक्टर साब घिस ही दीजिये "मैं बोली
"अरे निकलवा दो न बाद मे भी निकल्वाली पड़ेगी"पतिदेव बोले
मैं गुस्से मे उनकी तरफ़ देखि "नही डॉक्टर साब घिस ही दो
"ठीक है मुह खोलिए" अपना ड्रिलर लेकर वो तैयार हुए
इक लम्बी से चम्मच उन्होंने मेरे दांत की तरफ़ फसे ओर गर्र्र्र मैंने डर से आँखें बंद कर ली .लीजिये हो गया कुल्ला कर लीजिये आप नाहक ही डर रही थी . ये दवाई लीजिये दर्द बढे तो खा लेना ४-४ घंटे मे "
मे गाल पे हाथ रखते हुए उठी "थन्क यू डॉक्टर साब "
बच गयी हे माँ बचा लिया तुमने "मैं मन ही मन माँ का धन्यवाद दिया
"अभी नही तो २-३ महीने बाद आना ही पड़ेगा दांत निकलवाने"पतिदेव स्कूटर पे बैठते ही बोले
"अज्जी चुप करो मैं नही आउंगी दुबारा ओर दांत तुम निकलवा लेना मेरी जगह"
वोह मुस्कुरय की डॉक्टर ने उनका बदला इतने सालो का ले ही लिया .
ओर मै हाय हाय करते हुए घर को रवाना हुई "अब नही आउंगी पक्का "
घर पहुची तो रिंकू ने दरवाज़ा खोलते ही चिल्लाया "मम्मी ..... कामवाली आंटी बोल गई हैं की वो आज छुट्टी करेंगी"
मारे खुशी के आंसू आ गए ..इससे बेहतर सन्डे हो ही नही सकता कभी भी .
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